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International Multidisciplinary Research Journal Reviews (IMRJR)
International Multidisciplinary Research Journal Reviews (IMRJR) A monthly Peer-reviewed journal
ISSN Online 3108-026XISSN Print 3139-4833
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मीरा एक दिव्य चरित्र विरह एवं दासत्व भाव का साहित्यिक अध्ययन

नितिशा कौशल, प्रो. (डॉ.) दिग्विजय कुमार शर्मा

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सार : भक्तिकाल में मीराबाई एक दिव्य चरित्र की महान संत एवं कवयित्री है और उनके जीवन में गिरधर गोपाल के प्रति उनका विरह एवं दासत्व भाव उनके पदों द्वारा प्रतीत होता है | प्रस्तुत शोध पत्र द्वारा यह विश्लेषित किया जायेगा की मीराबाई किस प्रकार स्वयं को सांसारिक बन्धनों में बांधते हुए केवल गिरधर गोपाल के प्रति दासत्व और विरह भाव को चरम सीमा तक ले गईं | बाई सा का गिरधर गोपाल के प्रति आत्मसमर्पण उन्हें एक दिव्य चरित्र के रूप में परिलक्षित करता है एवं सर्व संपन्न कुल में जन्म लेने के पश्चात भी मीरा बाई के भीतर सांसारिक रिश्ते , धन-संपत्ति आदि किसी के प्रति भी कोई लगाव नहीं था वह केवल गिरधर गोपाल के प्रति समर्पित रहीं, देखा जाये तो जीव को भी इस देह को भूल आत्मा का परमात्मा से मिलन करवाने हेतु सांसारिक बन्धनों में स्वयं को इतना लिप्त नहीं करना चाहिए की देह छूटने के विचार से भी मानसिक पीड़ा का आभास हो | बाई सा ने आजीवन अनेको संतो से भेंट की परन्तु कभी तो किसी संप्रदाय में बंधी और ही किसी को अपना शिष्य बनाया | उनके अनुसार संसार में कोई भी बंधन चाहे वह संप्रदाय से जुड़ना ही क्यों हो , बंधन ही है, जो कभी कभी ईश्वर के प्राप्ति मार्ग में विघ्न ही उत्पन्न करेगा | निष्कर्षतः कहा जा सकता है की दिव्य चरित्र वाली मीरा का विरह एवं दासत्व भाव हिंदी साहित्य को एक अलग ही पहचान देता है  |

प्रमुख शब्द: मीराबाई, बाई सा, विरह भाव, दासत्व भाव, गिरधर गोपाल, दिव्य चरित्र, अलौकिक, भौतिकवाद, आत्मसमर्पण, साहित्यिक अध्ययन |

How to Cite:

[1] नितिशा कौशल, प्रो. (डॉ.) दिग्विजय कुमार शर्मा, “मीरा एक दिव्य चरित्र विरह एवं दासत्व भाव का साहित्यिक अध्ययन,” International Multidisciplinary Research Journal Reviews (IMRJR) (IMRJR), DOI: 10.17148/IMRJR.2026.030803

Creative Commons License This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License.
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